गुरुवार, 28 फ़रवरी 2013

जिज्ञासा- क्या संसार में कहीं सुरक्षा नहीं है ?????



आध्यात्मिक जिज्ञासा समाधान ~

 (स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक)


जिज्ञासा- क्या संसार में कहीं सुरक्षा नहीं है। मॉं की गोद में भी नहीं?

समाधान- संसार में कहीं भी सुरक्षा नहीं है। पूरी सुरक्षा केवल ’मोक्ष’ में है। तीन प्र्रकार से हम पर आपत्ति आ सकती है:-

एक तो अपनी मूर्खता से, अपनी गलतियों से हम नुकसान उठा लेते हैं। सड़क पर चलते हुए दुकान या बोर्ड देख रहे हैं। जिससे सड़क पर पड़े ऊॅंचे-नीचे पत्थरों पर हमने ध्यान नहीं दिया और पॉंव टकराया, धड़ाम से गिरे, हाथ-पॉंव टूट गए। किसकी गलती हुई? हमारी गलती।

सड़क पर केले का छिलका आ गया, हमने उस पर ध्यान नहीं दिया, पॉंव पड़ गया, धड़ाम से गिर गए और कमर की हड्डी टूट गई। किसकी गलती से? हमारी गलती से।

इस तरह एक क्षेत्र ऐसा है, जहॉं हम अपनी गलतियों से नुकसान उठाते हैं। अपनी मूर्खता से जो गलतियॉं की, उससे जो दुःख मिला, उसका नाम है- ’आध्यात्मिक दुःख’। 

दूसरा क्षेत्र ऐसा है, जहॉं दूसरे प्राणियों की गलतियों से हमको दुःख भोगना पड़ता है। आपका प्रश्न है कि क्या मॉं की गोद में हमको नुकसान हो सकता है? उत्तर है कि - मॉं ने कोई गलत दवा या खान-पान में कुछ गलत चीज खा ली तो बच्चे को नुकसान हो गया। पिता की भूल से हमको नुकसान हो सकता है। किसी पड़ोस के बच्चे ने क्रिकेट में बॉलिंग की और उसकी बॉल हमारी ऑंख में लगी। पूरी ऑंख बेकार हो गई। उसकी गलती से जीवन भर के लिए हमको नुकसान हो सकता है। सड़क पर चल रहे हैं। पीछे से चुपचाप एक कुत्ता आया और उसने टॉंग काट ली। स्कूटर वाला, कार वाला हमको ठोंक दे। हम ऐसे किसी गलत गुरु-आचार्य के पल्ले पड़ गए और उसने हमको उल्टे पाठ पढ़ा दिए और मोक्ष के मार्ग से कहीं और भटका दिया। उससे भी हमको नुकसान हो सकता है। दूसरे व्यक्तियों के कारण से, सॉंप से, बिच्छुओं से, शेर आदि दूसरे प्राणियों के कारण से, इनके अन्याय से भी हमको दुःख भोगने पड़ सकते हैं। इसे ’आधिभौतिक-दुःख’ कहते हैं।

तीसरी हैं - प्राकृतिक दुर्घटनाएं। जैसे - भूकंप, तूफान, बाढ़, ऑंधी, चक्रवात, सूखा, अकाल, वर्षा आदि। मकान गिर जाते हैं, बाढ़ का पानी भर जाता है। प्राकृतिक दुर्घटनाओं से भी हमको नुकसान उठाना पड़ता है तो दुःख होता है। इसी का नाम है- ’आधिदैविक-दुःख’।

उपरोक्त तीन प्रकार के दुःख हैं। आपने जन्म ले लिया तो कहीं भी सुरक्षा नहीं। कोई न कोई दुःख आएगा ही।

महर्षि कपिल कहते हैं - ’कुत्रापि कोऽपि सुखी न’। सीधा सरल वाक्य है। धरती पर कहीं भी कोई भी व्यक्ति पूरा सुखी नहीं है। एक सुख मिलता है, उसके पीछे चार दुःख आते हैं तो सौदा मॅंहगा पड़ता है। चार रुपए की खरीदी और बिक्री मूल्य एक रुपया। ये कैसा घाटे वाला व्यापार है। सुख मिलता है - ’एक’ और दुःख मिलते हैं - ’चार’। इसलिए चारों ओर दुःख ही दुःख है। धरती पर कोई भी पूर्ण सुखी नहीं है। दार्शनिक दृष्टि से सारे दुःखी हैं। दर्शन शाó मानसिक सुख-दुःख की बात कर रहा है। मन में अविद्या, क्रोध, लोभ आदि के कारण सारे लोग दुःखी हैं। इस दृष्टि से दुःख अधिक है।

सत्यार्थ प्रकाश’ में महर्षि दयानंद जी ने लिखा है कि संसार में सुख अधिक है। उनका तात्पर्य है कि - शारीरिक स्तर पर, बाह्य स्तर पर सुख अधिक है। महर्षि दयानंद बाह्य स्तर की बात कर रहे हैं और महर्षि कपिल, महर्षि पत´जलि आन्तरिक स्तर की बात कह रहे हैं। दोनों ठीक कह रहे हैं। बाह्य स्तर पर तो सुख अधिक है और मानसिक स्तर पर दुःख अधिक है। शारीरिक और मानसिक दोनों दुःख की तुलना करते हैं तो मानसिक ज्यादा हानिकारक है। और मानसिक स्तर पर दुःख अधिक है। इसलिए कपिल मुनि जी कहते हैं - तीन दुःखों से छूटो।

यह मनुष्य का सबसे ऊॅंचा लक्ष्य है। पूरी सुरक्षा केवल मोक्ष में है। इसलिए फटाफट मोक्ष में सरक जाओ।

साभार-वैदिक आध्यात्मिक न्यास 

बुधवार, 20 फ़रवरी 2013

सत्यार्थ प्रकाश सूर्यादि पर सृष्टि ?


1."एक भूमि के पास एक चन्द्र और

अनेक चन्द्र, अनेक भूमियो के मध्य में एक सूर्य रहता है।"
देखिये यहाँ पर महर्षि दयानंद ने स्पष्ट रूप से सौर मंडल का चित्रण किया है।
और अनेक सौर मंडलों का वर्णन भी किया है।
(जबकि अन्य किसी भी धर्म/ पुस्तक में अन्य सौर मंडलों की तो छोड़िये
सूर्य के अतिरिक्त अन्य किसी सूर्य की कल्पना भी नहीं की गयी है)


2. "पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, चन्द्र, नक्षत्र और सूर्य इनका नाम वसु इसलिए है क्योंकि इन्ही में सब पदार्थ और प्रजा वसती है और ये ही सबको वसाते हैं।"इन वसुओ में ही सब पदार्थ और प्रजा वसती है। इनके अतिरिक्त किसी स्थान पर नहीं।इन्ही सब पदार्थो से प्रजा (प्रकृति और जीव का सम्मिलन) उत्पन्न होते हैं।


3. "जब पृथ्वी के समान सूर्य चन्द्र और नक्षत्र हैं, पश्चात् उनमे इसी प्रकार (मनुष्य आदि) प्रजा के होने में क्या सन्देह ?"इस बात को समझने के लिए एक उदहारण लेते हैं।""एशिया में हाथी आदि जंगली जीव बसते हैं"इसका अभिप्राय यह नहीं की पुरे एशिया में हाथी बसते हैं।ईरान, अफगानिस्तान, रूस आदि में हाथी नहीं पाए जाते।परन्तु अन्य जंगली जीव बसते हैं।उसी प्रकार विभिन्न वसुओं पर विभिन्न योनि के जीव बसते हैं।


4. यहाँ पर यह प्रश्न उठता हैकि सूर्य पर 100000 डिग्री से अधिक तापमान है तो वहां प्रजा कैसे हो सकती है।उत्तर : यह कोई आवश्यक नहीं कि सूर्य, मंगल, बृहस्पति, टाइटन आदि वसुओ पर पृथ्वी के स्वरूप में ही प्रजा हो।बहुत संभव है कि विभिन्न पाप-पुन्य कर्मो स्तर वाले जीवो को वहां पर भोगने हेतु जन्म मिलता हो।जैसे महासागरो में हाथी तो जन्म नहीं मिलता और वन में व्हेल मछली को नहीं ।


5. पृथ्वी के महासागरो में कई किलोमीटर नीचे रंगहीन जंतु पाए गए हैं।उनको देखे जाने से पहले कोई सोच भी नहीं सकता थाकि बिना हाइड्रोकार्बन की उपलब्धता के भी जीवन संभव है।जब मनुष्य सूर्य आदि पर पहुँचने का सामर्थ्य हासिल कर लेगा तो अवश्य ही उन जन्तुओ को देख पायेगा।अभी तक तो पृथ्वी के ही 97% महासागरो का ही अन्वेषण बाकि है

समाधाता -श्री अश्विनी जी आर्यवीर

बुधवार, 13 फ़रवरी 2013

क्या जीव का ईश्वर में लय हो जाता है ?

क्या जीव ईश्वर का में लय हो जाता है  ?
समाधाता - आचार्य सत्यजित जी 

जीव मोक्ष पाकर ब्रह्म में रहता है, ऐसा एक स्थान पर स्वामी जी ने लिखा है, (सत्यार्थप्रकाश समुल्लास ९, पृष्ठ २५॰, संस्करण ३८)। ब्रह्म का तात्पर्य हुआ परमेश्वर। यदि ऐसा हो तो पुनः जन्म का प्रश्न नहीं होना चाहिए। परन्तु एक स्थान पर यह भी लिखा है कि ब्रह्म में लय होना समुद्र में डूब मरना है। यह भी लिखा है कि ब्रह्म जीव, जीव ब्रह्म एक कभी नहीं होता। इन दोनों बातों में विराधाभास प्रतीत होता है।

जिज्ञासु-रवीन्द्र कुमार, ई-२३२, सरिता विहार, नई दिल्ली।

समाधान- जिज्ञासा में उद्धृत सत्यार्थप्रकाश समुल्लास ९ की उन पंक्तियों को इस संदर्भ में देख लेना उचित रहेगा।

सत्यार्थप्रकाश समुल्लास ९- ‘‘प्रश्न-मुक्ति में जीव का लय होता है, वा विद्यमान रहता है ? उत्तर- विद्यमान रहता है। प्रश्न- कहां रहता है ? उत्तर- ब्रह्म में।’’

यहां महर्षि ने यह तो लिखा है कि जीव मुक्ति में ब्रह्म में रहता है, किन्तु साथ में यह भी लिखा है कि जीव स्वयं भी विद्यमान रहता है। महर्षि ब्रह्म व जीव की भिन्न-भिन्न सत्ता मानते हैं, ब्रह्म कभी जीव नहीं होता और जीव कभी ब्रह्म नहीं होता। 

जीव के ब्रह्म में रहने का यह अर्थ कथमपि नहीं है कि दोनों की पृथक्-पृथक् सत्ता नहीं रही, दोनों एक ही हो गये। अतः जीव के सर्वव्यापक होने की आशंका भी नहीं की जा सकती। मुक्ति से पुनः जन्म मानने में भी इससे कोई बाधा नहीं आती।

जीव के ईश्वरमय होने के दो अर्थ हो सकते हैं। पहला- दोनों का पृथक् अस्तित्व न रहकर, एक ही अस्तित्व हो जाना, दूसरा- जीव का ईश्वर के ‘आनन्द’ गुण से युक्त हो जाना। यहां दूसरा अर्थ सिद्धान्ततः ठीक है। चूंकि ईश्वर आनन्दस्वरूप है, मुक्ति में जीव भी उसके आनन्द को पाकर आनन्दमय हो जाता है, अतः उसे इस दृष्टि से ईश्वरमय हो जाना कहा जा सकता है। अतः जीव-ब्रह्म की पृथक्ता का कथन इससे बाधित नहीं होता। जीव व ब्रह्म का अस्तित्व सदा पृथक् रहता है, दोनों में गुण-धर्मों की भिन्नता सदा रहती है। स्थान-देश की दृष्टि से जीव सदा ब्रह्म में ही रहता है। ब्रह्म के सर्वव्यापक होने से जीव कभी भी ब्रह्म से पृथक् स्थान पर नहीं जा सकता, नहीं मिल सकता।

साभार- परोपकारी मासिकी पत्रिका, अजमेर

सोमवार, 11 फ़रवरी 2013

मृतक-दाह के बाद कर्म



समाधाता- आचार्य सत्यजित् जी

मृतक-दाह के बाद कर्म




सत्यार्थप्रकाश के द्वितीय समुल्लास में भूत-प्रेत का निषेध करते हुए महर्षि लिखते हैं कि- जब गुरु का प्राणान्त हो, तो मृतक शरीर का दाह करने हारा शिष्य प्रेतहार मृतक को उठाने वालों के साथ (अर्थात् कम से कम चार व्यक्ति) दशवें दिन शुद्ध होता है।

इसका अर्थ यह हुआ कि उस घर के चार या अधिक व्यक्ति दस दिन तक शुद्ध नहीं समझे जाते। अतः एव पौराणिक प्रणाली दश या ग्यारह या तेरह दिन के मनाने की सही प्रतीत होती है।

दूसरी और संस्कारविधि यह कहती है कि तीसरे दिन अस्थि-चयन के उपरान्त कुछ करना शेष नहीं रहता और आर्यसमाजी लोग तीसरे-चौथे दिन शान्ति सभा के उपरान्ते कोई अशुद्धि आदि नहीं मानते। क्या सही है और क्यों ?

जिज्ञासु- रवीन्द्र कुमार, ई-232, सरिता विहार, नई दिल्ली,

समाधाता- आचार्य सत्यजित् जी, ऋषि उद्यान, अजमेर

समाधान- सत्यार्थप्रकाशसंस्कारविधि में लिखी बातों पर जिज्ञासा की गई है, आइये पहले उन्हें शब्दशः देख लेते हैं, फिर समाधान शीघ्र ही समझ में आ जायेगा।

सत्यार्थप्रकाश समुल्लास २- ‘‘ जो-जो विद्याधर्मविरुद्ध भ्रान्तिजाल में गिराने वाले व्यवहार हैं, उनका भी उपदेश कर दें, जिससे भूत, प्रेत आदि मिथ्या बातों का विश्वास न हो।’’

गुरोः प्रेतस्य शिष्यस्तु पितृमेधं समाचरन्।
प्रतहारैः समं तत्र दशरात्रेण शुध्यति।।

अर्थ:- ‘‘जब गुरु का प्राणान्त हो, तब मृतक शरीर जिसका नाम ‘प्रेत’ है उसका दाह करने हारा शिष्य अर्थात् मृतक को उठाने वालों के साथ दसवें दिन शुद्ध होता है। और जब उस शरीर का दाह हो चुका तब उसका नाम ‘भूत’ होता है अर्थात् वह अमुकनामा पुरुष था। जितने उत्पन्न हों वर्तमान में आ के न रहें, वे भूतस्थ होने से उनका नाम भूत है। ऐसा ब्रह्मा से लेके आज पर्यन्त के विद्वानों का सिद्धान्त है। परन्तु जिनको शंका, कुसंग, कुसंस्कार होता है, उसको भय और शंकारूप भूत, प्रेत, शाकिनी, डाकिनी आदि अनेक भ्रमजाल दुःखदायक होते हैं।’’

संस्कारविधि-अन्त्येष्टिप्रकरणम्- ‘‘तत्पश्चात् जब तीसरा दिन हो, तब मृतक का कोई सम्बन्धी श्मशान में जाकर, चिता से अस्थि उठा के, उस श्मशान भूमि में कहीं पृथक् रख देवे, बस इसके आगे मृतक के लिये कुछ भी कर्म कर्त्तव्य नहीं है।’’

अब समाधान दिया जाता है। प्रथम तो इन दोनों उद्धरणों में वस्तुतः कोई विराध नहीं है। सत्यार्थप्रकाश वाले उद्धरण में यद्यपि दशवें दिन दाह करने वाले व अर्थी उठाने वाले की शुद्धि की बात लिखी है, किन्तु संस्कारविधि वाले उद्धरण में शुद्धि की कोई नहीं लिखी है। संस्कारविधि में जो तीसरे दिन का कथन है, वह मृतक के लिए कर्म करने से सम्बन्धित है न कि दाह करने या अर्थी उठाने वालों के सम्बन्ध में। अतः भिन्न-भिन्न विषय वाले उद्धरण होने से इन दोनों उद्धरणों में परस्पर कोई विरोध नहीं है।

द्वितीय- सत्यार्थप्रकाश वाले उद्धरण में भी जो दशवें दिन शुद्ध होने का लिखा है, वहां शुद्धि का कोई प्रकरण नहीं है। वहां आगे-पीछे का लेख देखने से स्पष्ट है कि महर्षि यहां भूत व प्रेत शब्द का अर्थ बताना चाहते हैं ताकि तत्सम्बन्धी भ्रांति हट सके। यहां मनुस्मृति के श्लोक को दना व उसका अर्थ करना शुद्धि की बात बताने के लिए नहीं है। यह स्पष्ट ही ‘प्रेत’ व ‘भूत’ शब्दों के अर्थ को समझाने मात्र के लिए है। शुद्धि का यहां कोई प्रसंग नहीं है।

अब प्रश्न उठेगा कि दाह करने वालों व अर्थी उठाने वालों की शुद्धि महर्षि कौन से दिन मानते हैं ? ऊपर उद्धृत संस्कारविधि के अंश में जो तीसरे दिन का उल्लेख है, वह भी इस प्रसंग का नहीं है। इस विषय में संस्कारविधि अन्त्येष्टिप्रकरण के अन्त का ही एक अन्य उद्धरण संकेत करता है। वहां लिखा है-

‘‘जब शरीर भस्म हो जोव, पुनः सब जने वस्त्र प्रक्षालन स्नान करके, जिसके घर में मृत्यु हुआ हो, उसके घर की मार्जन, लेपन, प्रक्षालनादि से शुद्धि करके.....मन्त्रों से आहुति देवें।

इससे स्पष्ट है कि दाह-कर्म में सम्मिलित व्यक्तियों की शुद्धि तो स्नान व वस्त्र-प्रक्षालन से उसी समय हो जाती है, तथा गृह की शुद्धि उसी दिन या अगले दिन हवन पूरा होने पर हो जाती है। ऐसे में दस दिन वाली बात महर्षि के सम्मत प्रतीत नहीं आती। दश दिन का कथन तो श्लोक का अर्थ करते हुए मात्र आ गया है। वैसे भी मनुस्मृति में इस श्लो को व इसके आसपास के अनेक श्लोकों को डॉ. सुरेन्द्र कुमार जी ने मनुस्मृति में प्रक्षिप्त सिद्ध किया है। इन श्लोकों में तो विदेशस्थ व्यक्ति की अशुद्धि-शुद्धि की भी बात लिखी है, जिसका कि मृतक से स्पर्श व उसके घर में प्रवेश तक नहीं होता। अतः ये श्लोक शुद्धि-अशुद्धि की दृष्टि से अमान्य है। इस प्रकार स्नान व वस्त्र-प्रक्षालन से उसी दिन शुद्धि का होना माना जा सकता है।

साभार-परोपकारी पत्रिका