आध्यात्मिक जिज्ञासा समाधान ~
(स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक)
जिज्ञासा- क्या संसार में कहीं सुरक्षा नहीं है। मॉं की गोद में भी नहीं?
समाधान- संसार में कहीं भी सुरक्षा नहीं है। पूरी सुरक्षा केवल ’मोक्ष’ में है। तीन प्र्रकार से हम पर आपत्ति आ सकती है:-
एक तो अपनी मूर्खता से, अपनी गलतियों से हम नुकसान उठा लेते हैं। सड़क पर चलते हुए दुकान या बोर्ड देख रहे हैं। जिससे सड़क पर पड़े ऊॅंचे-नीचे पत्थरों पर हमने ध्यान नहीं दिया और पॉंव टकराया, धड़ाम से गिरे, हाथ-पॉंव टूट गए। किसकी गलती हुई? हमारी गलती।
सड़क पर केले का छिलका आ गया, हमने उस पर ध्यान नहीं दिया, पॉंव पड़ गया, धड़ाम से गिर गए और कमर की हड्डी टूट गई। किसकी गलती से? हमारी गलती से।
इस तरह एक क्षेत्र ऐसा है, जहॉं हम अपनी गलतियों से नुकसान उठाते हैं। अपनी मूर्खता से जो गलतियॉं की, उससे जो दुःख मिला, उसका नाम है- ’आध्यात्मिक दुःख’।
दूसरा क्षेत्र ऐसा है, जहॉं दूसरे प्राणियों की गलतियों से हमको दुःख भोगना पड़ता है। आपका प्रश्न है कि क्या मॉं की गोद में हमको नुकसान हो सकता है? उत्तर है कि - मॉं ने कोई गलत दवा या खान-पान में कुछ गलत चीज खा ली तो बच्चे को नुकसान हो गया। पिता की भूल से हमको नुकसान हो सकता है। किसी पड़ोस के बच्चे ने क्रिकेट में बॉलिंग की और उसकी बॉल हमारी ऑंख में लगी। पूरी ऑंख बेकार हो गई। उसकी गलती से जीवन भर के लिए हमको नुकसान हो सकता है। सड़क पर चल रहे हैं। पीछे से चुपचाप एक कुत्ता आया और उसने टॉंग काट ली। स्कूटर वाला, कार वाला हमको ठोंक दे। हम ऐसे किसी गलत गुरु-आचार्य के पल्ले पड़ गए और उसने हमको उल्टे पाठ पढ़ा दिए और मोक्ष के मार्ग से कहीं और भटका दिया। उससे भी हमको नुकसान हो सकता है। दूसरे व्यक्तियों के कारण से, सॉंप से, बिच्छुओं से, शेर आदि दूसरे प्राणियों के कारण से, इनके अन्याय से भी हमको दुःख भोगने पड़ सकते हैं। इसे ’आधिभौतिक-दुःख’ कहते हैं।
तीसरी हैं - प्राकृतिक दुर्घटनाएं। जैसे - भूकंप, तूफान, बाढ़, ऑंधी, चक्रवात, सूखा, अकाल, वर्षा आदि। मकान गिर जाते हैं, बाढ़ का पानी भर जाता है। प्राकृतिक दुर्घटनाओं से भी हमको नुकसान उठाना पड़ता है तो दुःख होता है। इसी का नाम है- ’आधिदैविक-दुःख’।
उपरोक्त तीन प्रकार के दुःख हैं। आपने जन्म ले लिया तो कहीं भी सुरक्षा नहीं। कोई न कोई दुःख आएगा ही।
महर्षि कपिल कहते हैं - ’कुत्रापि कोऽपि सुखी न’। सीधा सरल वाक्य है। धरती पर कहीं भी कोई भी व्यक्ति पूरा सुखी नहीं है। एक सुख मिलता है, उसके पीछे चार दुःख आते हैं तो सौदा मॅंहगा पड़ता है। चार रुपए की खरीदी और बिक्री मूल्य एक रुपया। ये कैसा घाटे वाला व्यापार है। सुख मिलता है - ’एक’ और दुःख मिलते हैं - ’चार’। इसलिए चारों ओर दुःख ही दुःख है। धरती पर कोई भी पूर्ण सुखी नहीं है। दार्शनिक दृष्टि से सारे दुःखी हैं। दर्शन शाó मानसिक सुख-दुःख की बात कर रहा है। मन में अविद्या, क्रोध, लोभ आदि के कारण सारे लोग दुःखी हैं। इस दृष्टि से दुःख अधिक है।
सत्यार्थ प्रकाश’ में महर्षि दयानंद जी ने लिखा है कि संसार में सुख अधिक है। उनका तात्पर्य है कि - शारीरिक स्तर पर, बाह्य स्तर पर सुख अधिक है। महर्षि दयानंद बाह्य स्तर की बात कर रहे हैं और महर्षि कपिल, महर्षि पत´जलि आन्तरिक स्तर की बात कह रहे हैं। दोनों ठीक कह रहे हैं। बाह्य स्तर पर तो सुख अधिक है और मानसिक स्तर पर दुःख अधिक है। शारीरिक और मानसिक दोनों दुःख की तुलना करते हैं तो मानसिक ज्यादा हानिकारक है। और मानसिक स्तर पर दुःख अधिक है। इसलिए कपिल मुनि जी कहते हैं - तीन दुःखों से छूटो।
यह मनुष्य का सबसे ऊॅंचा लक्ष्य है। पूरी सुरक्षा केवल मोक्ष में है। इसलिए फटाफट मोक्ष में सरक जाओ।
साभार-वैदिक आध्यात्मिक न्यास


