सोमवार, 11 फ़रवरी 2013

मृतक-दाह के बाद कर्म



समाधाता- आचार्य सत्यजित् जी

मृतक-दाह के बाद कर्म




सत्यार्थप्रकाश के द्वितीय समुल्लास में भूत-प्रेत का निषेध करते हुए महर्षि लिखते हैं कि- जब गुरु का प्राणान्त हो, तो मृतक शरीर का दाह करने हारा शिष्य प्रेतहार मृतक को उठाने वालों के साथ (अर्थात् कम से कम चार व्यक्ति) दशवें दिन शुद्ध होता है।

इसका अर्थ यह हुआ कि उस घर के चार या अधिक व्यक्ति दस दिन तक शुद्ध नहीं समझे जाते। अतः एव पौराणिक प्रणाली दश या ग्यारह या तेरह दिन के मनाने की सही प्रतीत होती है।

दूसरी और संस्कारविधि यह कहती है कि तीसरे दिन अस्थि-चयन के उपरान्त कुछ करना शेष नहीं रहता और आर्यसमाजी लोग तीसरे-चौथे दिन शान्ति सभा के उपरान्ते कोई अशुद्धि आदि नहीं मानते। क्या सही है और क्यों ?

जिज्ञासु- रवीन्द्र कुमार, ई-232, सरिता विहार, नई दिल्ली,

समाधाता- आचार्य सत्यजित् जी, ऋषि उद्यान, अजमेर

समाधान- सत्यार्थप्रकाशसंस्कारविधि में लिखी बातों पर जिज्ञासा की गई है, आइये पहले उन्हें शब्दशः देख लेते हैं, फिर समाधान शीघ्र ही समझ में आ जायेगा।

सत्यार्थप्रकाश समुल्लास २- ‘‘ जो-जो विद्याधर्मविरुद्ध भ्रान्तिजाल में गिराने वाले व्यवहार हैं, उनका भी उपदेश कर दें, जिससे भूत, प्रेत आदि मिथ्या बातों का विश्वास न हो।’’

गुरोः प्रेतस्य शिष्यस्तु पितृमेधं समाचरन्।
प्रतहारैः समं तत्र दशरात्रेण शुध्यति।।

अर्थ:- ‘‘जब गुरु का प्राणान्त हो, तब मृतक शरीर जिसका नाम ‘प्रेत’ है उसका दाह करने हारा शिष्य अर्थात् मृतक को उठाने वालों के साथ दसवें दिन शुद्ध होता है। और जब उस शरीर का दाह हो चुका तब उसका नाम ‘भूत’ होता है अर्थात् वह अमुकनामा पुरुष था। जितने उत्पन्न हों वर्तमान में आ के न रहें, वे भूतस्थ होने से उनका नाम भूत है। ऐसा ब्रह्मा से लेके आज पर्यन्त के विद्वानों का सिद्धान्त है। परन्तु जिनको शंका, कुसंग, कुसंस्कार होता है, उसको भय और शंकारूप भूत, प्रेत, शाकिनी, डाकिनी आदि अनेक भ्रमजाल दुःखदायक होते हैं।’’

संस्कारविधि-अन्त्येष्टिप्रकरणम्- ‘‘तत्पश्चात् जब तीसरा दिन हो, तब मृतक का कोई सम्बन्धी श्मशान में जाकर, चिता से अस्थि उठा के, उस श्मशान भूमि में कहीं पृथक् रख देवे, बस इसके आगे मृतक के लिये कुछ भी कर्म कर्त्तव्य नहीं है।’’

अब समाधान दिया जाता है। प्रथम तो इन दोनों उद्धरणों में वस्तुतः कोई विराध नहीं है। सत्यार्थप्रकाश वाले उद्धरण में यद्यपि दशवें दिन दाह करने वाले व अर्थी उठाने वाले की शुद्धि की बात लिखी है, किन्तु संस्कारविधि वाले उद्धरण में शुद्धि की कोई नहीं लिखी है। संस्कारविधि में जो तीसरे दिन का कथन है, वह मृतक के लिए कर्म करने से सम्बन्धित है न कि दाह करने या अर्थी उठाने वालों के सम्बन्ध में। अतः भिन्न-भिन्न विषय वाले उद्धरण होने से इन दोनों उद्धरणों में परस्पर कोई विरोध नहीं है।

द्वितीय- सत्यार्थप्रकाश वाले उद्धरण में भी जो दशवें दिन शुद्ध होने का लिखा है, वहां शुद्धि का कोई प्रकरण नहीं है। वहां आगे-पीछे का लेख देखने से स्पष्ट है कि महर्षि यहां भूत व प्रेत शब्द का अर्थ बताना चाहते हैं ताकि तत्सम्बन्धी भ्रांति हट सके। यहां मनुस्मृति के श्लोक को दना व उसका अर्थ करना शुद्धि की बात बताने के लिए नहीं है। यह स्पष्ट ही ‘प्रेत’ व ‘भूत’ शब्दों के अर्थ को समझाने मात्र के लिए है। शुद्धि का यहां कोई प्रसंग नहीं है।

अब प्रश्न उठेगा कि दाह करने वालों व अर्थी उठाने वालों की शुद्धि महर्षि कौन से दिन मानते हैं ? ऊपर उद्धृत संस्कारविधि के अंश में जो तीसरे दिन का उल्लेख है, वह भी इस प्रसंग का नहीं है। इस विषय में संस्कारविधि अन्त्येष्टिप्रकरण के अन्त का ही एक अन्य उद्धरण संकेत करता है। वहां लिखा है-

‘‘जब शरीर भस्म हो जोव, पुनः सब जने वस्त्र प्रक्षालन स्नान करके, जिसके घर में मृत्यु हुआ हो, उसके घर की मार्जन, लेपन, प्रक्षालनादि से शुद्धि करके.....मन्त्रों से आहुति देवें।

इससे स्पष्ट है कि दाह-कर्म में सम्मिलित व्यक्तियों की शुद्धि तो स्नान व वस्त्र-प्रक्षालन से उसी समय हो जाती है, तथा गृह की शुद्धि उसी दिन या अगले दिन हवन पूरा होने पर हो जाती है। ऐसे में दस दिन वाली बात महर्षि के सम्मत प्रतीत नहीं आती। दश दिन का कथन तो श्लोक का अर्थ करते हुए मात्र आ गया है। वैसे भी मनुस्मृति में इस श्लो को व इसके आसपास के अनेक श्लोकों को डॉ. सुरेन्द्र कुमार जी ने मनुस्मृति में प्रक्षिप्त सिद्ध किया है। इन श्लोकों में तो विदेशस्थ व्यक्ति की अशुद्धि-शुद्धि की भी बात लिखी है, जिसका कि मृतक से स्पर्श व उसके घर में प्रवेश तक नहीं होता। अतः ये श्लोक शुद्धि-अशुद्धि की दृष्टि से अमान्य है। इस प्रकार स्नान व वस्त्र-प्रक्षालन से उसी दिन शुद्धि का होना माना जा सकता है।

साभार-परोपकारी पत्रिका


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